हमारा जीवन......
जन्म -मरण के कालचक्र में,
फँसा हमारा जीवन रे।
कहीं- क्रोध की पहन चोलना,
लोभ -मोह का बंधन रे।
अहंकारवश रोगग्रस्त है,
आधि- व्याधि दुःख-दंशन रे।
शान-घमंड में बीता जीवन,
छल-कपट अंतिम इंधन रे।
ईर्ष्या- द्वेष की चिता जली है,
झुलस रहा है तन- मन रे।
सुजाता प्रिय
फँसा हमारा जीवन रे।
कहीं- क्रोध की पहन चोलना,
लोभ -मोह का बंधन रे।
अहंकारवश रोगग्रस्त है,
आधि- व्याधि दुःख-दंशन रे।
शान-घमंड में बीता जीवन,
छल-कपट अंतिम इंधन रे।
ईर्ष्या- द्वेष की चिता जली है,
झुलस रहा है तन- मन रे।
सुजाता प्रिय
बहुत खूबसूरत प्रस्तुति
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