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Showing posts from April, 2019
स्वप्न.... स्वप्न स्वप्न सुनहरे जीवन के हो जाएँ साकार। मानव का मानव जन से रहे  सदा ही प्यार। ऊँच-नीच का भेद हमारा जड़ से ही मिट जाए। छल-कपट सा दुर्गुण जग में कभी न आने पाए। सच्चाई की स्वर्ण- पताका जग- भर में लहराए। झूठ,फरेब,मक्कारी जल के बुलबुले सा ढह जाए। शान-घमंड,विद्वेष भावना कभी न आए पास। सब पर सबको -मोह रहे सब पर सदा विश्वास। परहितकारी कर्म में तनिक नहीं संशय हो। सुख पहुचाऊँ सदा सभी को मन में दृढ़ निश्चय हो।             सुजाता प्रिय

अपराजिता

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हमारा जीवन......

जन्म -मरण के कालचक्र में, फँसा हमारा जीवन रे। कहीं- क्रोध की पहन चोलना, लोभ -मोह का बंधन रे। अहंकारवश रोगग्रस्त है, आधि- व्याधि दुःख-दंशन रे। शान-घमंड में बीता जीवन, छल-कपट अंतिम इंधन रे। ईर्ष्या- द्वेष की चिता जली है, झुलस रहा है तन- मन रे।       सुजाता प्रिय
कहती खूब कहानी जी----- मेरी बूढ़ी नानीजी। कहती खूब कहानी जी। कभी सुनहरी परियों वाली, चुनरी ओढ़े परियों वाली, पेड़ों पर की चिड़ियों वाली, जिसकी मीठा वाणी जी। कोई भूत- पिशाचों वाली, जादू- खेल तमाशों वाली, जमींदार और दासों वाली, बातें सभी पुरानी जी। कुछ में भालू - बंदर होेते, सिंह पिंजरे के अंतर होेते, कुछ में अंतर -मंतर होेते,  कुछ में राजा- कहानी जी। फूलों और गुलदस्ते  वाली, हल्वे - पूरी नस्ते वाली , छोटी- मोटी सस्ते वाली, करते आना- कहानी जी।            सुजाता प्रिय

हाथ बड़े

जब मैं रोती थी बचपन में,

फूलों की देखो

प्रसन्नता फूलों की देखो, कभी न भूलते हैं मुस्काना। चाहे तन झुलसे धूप में, चाहे ओस से बड़े नहाना। मधूरता फूलों की देखो, लगी फैलाए मीठी गंध। कीचड़ में भी जन्म लेकर, नहीं त्यागते कभी सुगंघ। कोमलता फूलों की देखो, कर पल रखते कोमलता भाव। चुभ जाते जब संग के काँटे, कभी भूल न करते ताव। चपलता फूलों की देखो, रखते मन में सदा उमंग। संकट में भी खुश हैं करते, झम ,नाच हर रितु के संग। धीरजता फूलों की देखो, दुःख पाकर भी धीरज रखते। तोड़ ले उनको डाली से कोई, फिर भी उसको कुछ न कहते। सहनसीलता उनकी देखो, पीड़ित हो भी हसते रहते। दंशित होकर भी भौरों से, हँस- हँस फब्ती कसते रहते। महानता फूलों की देखो, तनिक नहीं करते अभिमान। रंक-धनी का भेद न करते, सबको मनाने एक समान। फूलों के गुण अपनाकर, तुम भी महानता बन दिखलाओ। कर्म करो अच्छे-अच्छे, अच्छाई को अपनाओ।   साभार, सुजाता प्रिय