स्वप्न.... स्वप्न स्वप्न सुनहरे जीवन के हो जाएँ साकार। मानव का मानव जन से रहे सदा ही प्यार। ऊँच-नीच का भेद हमारा जड़ से ही मिट जाए। छल-कपट सा दुर्गुण जग में कभी न आने पाए। सच्चाई की स्वर्ण- पताका जग- भर में लहराए। झूठ,फरेब,मक्कारी जल के बुलबुले सा ढह जाए। शान-घमंड,विद्वेष भावना कभी न आए पास। सब पर सबको -मोह रहे सब पर सदा विश्वास। परहितकारी कर्म में तनिक नहीं संशय हो। सुख पहुचाऊँ सदा सभी को मन में दृढ़ निश्चय हो। सुजाता प्रिय
बेहतरीन रचना
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