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स्वप्न.... स्वप्न स्वप्न सुनहरे जीवन के हो जाएँ साकार। मानव का मानव जन से रहे  सदा ही प्यार। ऊँच-नीच का भेद हमारा जड़ से ही मिट जाए। छल-कपट सा दुर्गुण जग में कभी न आने पाए। सच्चाई की स्वर्ण- पताका जग- भर में लहराए। झूठ,फरेब,मक्कारी जल के बुलबुले सा ढह जाए। शान-घमंड,विद्वेष भावना कभी न आए पास। सब पर सबको -मोह रहे सब पर सदा विश्वास। परहितकारी कर्म में तनिक नहीं संशय हो। सुख पहुचाऊँ सदा सभी को मन में दृढ़ निश्चय हो।             सुजाता प्रिय

अपराजिता

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हमारा जीवन......

जन्म -मरण के कालचक्र में, फँसा हमारा जीवन रे। कहीं- क्रोध की पहन चोलना, लोभ -मोह का बंधन रे। अहंकारवश रोगग्रस्त है, आधि- व्याधि दुःख-दंशन रे। शान-घमंड में बीता जीवन, छल-कपट अंतिम इंधन रे। ईर्ष्या- द्वेष की चिता जली है, झुलस रहा है तन- मन रे।       सुजाता प्रिय
कहती खूब कहानी जी----- मेरी बूढ़ी नानीजी। कहती खूब कहानी जी। कभी सुनहरी परियों वाली, चुनरी ओढ़े परियों वाली, पेड़ों पर की चिड़ियों वाली, जिसकी मीठा वाणी जी। कोई भूत- पिशाचों वाली, जादू- खेल तमाशों वाली, जमींदार और दासों वाली, बातें सभी पुरानी जी। कुछ में भालू - बंदर होेते, सिंह पिंजरे के अंतर होेते, कुछ में अंतर -मंतर होेते,  कुछ में राजा- कहानी जी। फूलों और गुलदस्ते  वाली, हल्वे - पूरी नस्ते वाली , छोटी- मोटी सस्ते वाली, करते आना- कहानी जी।            सुजाता प्रिय